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Thursday, March 19, 2009

मसककली (part 4)

शाम को करीब 4 बजे इंस्पेक्टर ने घर आकर सबको बताया की अनिल का एक दोस्त अभी आज ही वापस लौटा है। उसी के घर से शिल्पा मिली थी। अनिल के दोस्त के कहने के मुताबिक अनिल और शिल्पा कॉलेज में ही मिले थे और अनिल को शिल्पा से प्यार हो गया था। कई बार अनिल ने शिल्पा को बताने की कोशिश की मगर हर बार वो शिल्पा से अपने दिल की बात नही बोल पाता था। उस दिन शिल्पा के भाई की शादी के दिन ही अनिल बहुत खुश था वो शिल्पा से अपने प्यार का इज़हार करना चाहता था। अनिल के दोस्त को उसी दिन किसी दुसरे शहर किसी काम से जाना था इसीलिए अनिल को उस घर की चाब्बियाँ दे दी ताकि वो वहां शिल्पा से अपने दिल की बात कह सके। इसके आगे अनिल के दोस्त को कुछ नही पता था की उस दिन क्या हुआ। कैसे अनिल की मौत हुई। और कैसे शिल्पा की यह हालत।

फिर इंस्पेक्टर ने बताया की शिल्पा की medical reports से पता चला है की शिल्पा के साथ बलात्कार (Rape) हुआ है। घर में जैसे सब जगह मातम सा ही छा गया हो। माँ को मामा और मामी ने संभाला और क्षितिज को सीमा को ने। इंस्पेक्टर के जाने के बाद भी घर का माहौल ख़राब हो चुका था। सब गुमसुम से हो गए थे। किसी से भी रात का खाना नही खाया गया। सीमा को भी समझ नही आ रहा था की आखिर हो क्या रहा है पहले ही उसकी शादी के दिन शिल्पा के इस तरह खो जाने से उसके मन में कैसे कैसे ख्याल आ रहे थे। सीमा को डर लगा हुआ था की कहीं कोई उसे ही कुछ बुरा न कह दे। आखिर उसके इस घर में कदम रखने से पहले ही इस घर के साथ इतना बुरा हो गया था। और घर के इस खामोश माहौल में तो वो और सहम सी गई थी। शिल्पा के साथ ऐसा कैसे हो सकता है वो तो बहुत ही हिम्मत वाली लड़की है। शिल्पा की मर्ज़ी के बिना शिल्पा को कोई छु भी नही सकता था फिर यह सब...शिल्पा ने अनिल के बारे में सीमा को बताया तो था। अनिल उसका सिर्फ़ एक दोस्त ही था और कुछ भी नही। फिर कैसे अनिल ने उसके साथ ज़बरदस्ती की। शिल्पा को कुछ पिलाया होगा। मगर फिर अनिल की मौत कैसे हुई। इतना कुछ सोचते सोचते सीमा अपने कमरे में आ गई।

वहां उसकी नज़र क्षितिज पे पड़ी जो चुपचाप कमरे के एक कोने में बैठा रो रहा था। उसके हाथो में एक फोटो एल्बम थी। सीमा क्षितिज के पास गबराए मन से गयी। उसने क्षितिज के कंधो पे अपना हाथ रखा तो क्षितिज फुट फुट के रोने लगा।

क्षितिज: "हमारी शिल्पा सीमा .....हमारी बच्ची... अभी तक उसने देखा ही क्या है... हमेशा बच्चो की तरह कोमल फूल की तरह पाला है उसे अब उसे इस तरह तडपता हुआ रोता भिल्खते हुए कैसे देख पाउँगा मैं।"

सीमा ने क्षितिज के सर को अपने कंधो पे रख कर प्यार से सहलाया। फिर बोली: "जानती हूँ मैं जानती हूँ क्षितिज वो मेरे लिए भी बच्ची की तरह ही है। मगर हमें माँ की तरफ भी देखना है क्षितिज। अभी तो मामा और मामी जी है उन्हें सँभालने के लिए। लेकिन एक बार उनके जाने के बाद हमको ही माँ और शिल्पा दोनों को संभालना है। मैं खुद....."

कहते कहते रुक गयी सीमा ...क्षितिज ने उसकी आँखों में डर देख लिया था। उसने सीमा को अपनी बाँहों में भर लिया...फिर बोला..."हाँ जानता हूँ हमें ही अब सब हमें ही संभालना है मगर कैसे संभालना है ये सोच सोच कर....."

सीमा: "मैं समझ सकती हूँ की शिल्पा इस वक़्त क्या सोच रही होगी। उसपे क्या बीत रही होगी।" कहते ही सीमा रोने लगी। क्षितिज ने उसे संभाला...मगर क्षितिज को क्या पता था की उसे एक और कड़वा सच सुनना है....सीमा रो रो के बोलती चली गयी...क्षितिज से कुछ नहीं छिपाया उसने। (सीमा की कहानी पढिये >>>"निम्मो बुआ")

क्षितिज: "तुमने मुझे पहले ये सब क्यूँ नहीं बताया...." फिर थोडी देर बाद सोच कर खुद बोला "शायद में समझ नहीं पाता यह सब लेकिन अब अच्छे से समझ रहा हूँ। क्यूँ ऐसा होता है क्यूँ समाज हमेशा लड़कियों को ही दोषी ठहराता है। क्यूँ लड़कियों को इन बातों के लिए शर्मिदा किया जाता है। क्यूँ उनके आत्मविश्वास आत्मसमान को बार बार यूँ गिरा दिया जाता है। लड़के सब कुछ गलत करके भी साफ़ शरीफ होने का दावा करते है। और लड़कियां शरीफ हो कर भी जिल्लत की ज़िन्दगी जीती है। यह कैसा समाज है"

सीमा: "क्षितिज शायद मैं तुमको यह सब कभी नहीं बता पाती या फिर कभी न कभी तुमको बता देती। पर आज मुझे लगा की उस वक़्त जो मेरे साथ हुआ आज वो मुझे शिल्पा को समझने में और उसका पूरा साथ देने में मेरी मदद कर सकता है। मैं आज उसे वही आत्मविश्वास और आत्मसमान के साथ जीना सिखा सकती हूँ जिस पर उसका पूरा हक है। हम शिल्पा को कभी यह एहसास नहीं होने देंगे की उसकी ज़िन्दगी बर्बाद हो चुकी है पूरी दुनिया समाज कुछ भी कहे.....हमें पता है वो किस दौर से गुज़र रही है कोई उसे अपनाए या न अपनाए हम लोग उसे हमेशा उसके साथ रहेंगे। उसे पूरी हिम्मत देंगे इस समाज में रहने की" दोनों रात भर इसी तरह रोते रहे। एक दुसरे को सहारा देते रहे।

अगले दिन दोनों शिल्पा को लेने के लिए हॉस्पिटल गए। वहां इंस्पेक्टर पहले से ही मौजूद था।

इंस्पेक्टर: "मुझे शिल्पा जी का बयान लेना है। अनिल के दोस्त ने जो बताया है वो काफी नहीं है। हमें शिल्पा जी से भी उनकी आप बीती पूछनी होगी। मैं चाहता था की शिल्पा का बयान उसके घरवालो के सामने ही लिया जाए ताकि बाद में बयान को बदलने के लिए आप उसपे दबाब न डाले..आप लोग भी उसके दिए बयान पर अपने हस्ताक्षर करेंगे इसलिए मैं आपका इंतज़ार कर रहा था। देखिये मैं आपको बता दूं की शिल्पा जी कुछ दिनों तक नारी सशक्तिकरण संस्थान में कुछ दिन जाना पड़ेगा और मैं उम्मीद करता हूँ आप उसे पूरा सहियोग देंगे।"

सीमा: "आप चिंता ना करे इंस्पेक्टर साहेब हम लोग शिल्पा को पूरा support देंगे। उसे उसकी ज़िन्दगी वापस शुरू करने के लिए पूरा सहियोग"

इंस्पेक्टर: "सब यही कहते है मैडम...मगर फिर धीरे धीरे उनके घर वाले ही उन्हें mental torture करते है। वो कहते है ना कहना असान होता है करना मुश्किल ....और अगर कोई परिवार अपनों को ऐसे में सहियोग दे भी तो यह समाज उनके हाथ बांध देता है और उनका दिमाग भी समाज की सोच के साथ हो जाता है। और वो भी वही करते है जो समाज उनसे करवाना चाहता है।"

क्षितिज: "ये आप क्या कह रहे है इंस्पेक्टर...हम लोग पढ़े लिखे अच्छे घर से है। हमें अच्छी तरह पता है की क्या सही है क्या गलत। हम समाज के साथ अपनी सोच नहीं बदलेंगे। हम बिलकुल शिल्पा का साथ देंगे "

इंस्पेक्टर: "जी हाँ मैं जानता हूँ समाज आप जैसे पढ़े लिखे लोगो की सोच को किस तरह बदल देता है...क्षितिज साहब मत भूलिए इस देश में आज भी पढ़े लिखे लोग भी दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों को समाज से नहीं निकल पायी है..बल्कि आप जैसे पढ़े लिखे लोग भी समय आने पर खुद समाज जैसे हो जाते है।"

"आप लोग patient से मिल सकते है" नर्स की इस आवाज़ से क्षितिज और इंस्पेक्टर की बहस ख़त्म हो गयी।

तीनो शिल्पा के कमरे की और चल दिए....कमरे के बाहर से ही शिल्पा को देखा तो शिल्पा की हालत बहुत ख़राब थी उसके बदन में जहाँ तहां पट्टियां, चोट और खरोचें लगी हुई थी। न क्षितिज और न ही सीमा उसे अच्छे से देख पा रहे थे दोनों ने अपनी ऑंखें बंद कर ली और रोने लगे। इंस्पेक्टर बोला "इसकी हालत इस से भी ज्यादा ख़राब थी। आज फिर भी वो बोल पाएगी ऐसा डॉक्टर का कहना है। चलिए अंदर चलते है.."

सीमा को तो लगा जैसे उसकी वो मसककली उसकी वो कबूतरी जो हमेशा मस्त गगन में खुली हवा में उड़ती रहती थी। हर वक़्त वही करती थी जो उसका मन करता था....यही चुलबुली लड़की....वो मसककली.....आज इस तरह लाचार गुमसुम खोयी खोयी जैसे किसी ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया हो। उसे किसी डरवाने पिंजरे में रख दिया हो जैसे उसके पर किसी ने काट ही दिए हो....यकीन ही नहीं हो रहा था की यह वही मसककली है....क्या अब यह मसककली कभी पहले की तरह खुली हवा में मन चाहे गगन में उड़ पायेगी...क्या सीमा सच में शिल्पा को वो आत्मविश्वास और उसका खोया आत्मसमान फिर उसे लौटा पायेगी। सीमा को जैसे हर जगह बस प्रशन चिन्ह ही दिख रहा था।

to be continue....

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Tuesday, March 17, 2009

First manager paid by none

Once apon a time when GOD already created the Earth
He created water to drink, sun to light and air to breath
then he created plants, animals and all other beautiful nature
He took a break while he wanted to make his best creature

He was tired He just for fun gave all his emotions, values and brain
He thought its enough time for that break and back to his work again
He make its best creature and named all it human who live in his world with peace
after that he turned to his other creation which he make in break is really a masterpiece
He take a look and smile over it as he just sight his most beautiful, stunning and best production
He knew it he can't make it over again and again thats why he introduced new concept of reproduction

His masterpiece is indeed a masterpiece but the other creature of its own doesn't know how to treat her
they think she is a GOD gift for them to have a fun, they can use her as they want to so they take her
the man took the woman and greet her as his wife,
he promised GOD that she will be with him for his whole life
he promised to care of her, love her, understand her and never to be harsh with her
first he take care of her as he promised he is always busy to treat her and fun with her

GOD was confused that He make human to take care of his whole world
But human is always busy with the Gift GOD has gifted to him as a award
Now he wanted to add some business in this world
he ask from all to be managed and organised his world
Man was asked too but he is busy in his own work
Woman listen the GOD and say yes for that work
She asked to be a first manager and the man's bosses
she said yes and proudly accepted all the Gain and Loses

GOD make man to be her labour
she can ask to man for her any favour
but she already falled in love of her man
how can she ask a favour from her man
she has to do all her stuff's her own
so she ask her man to go and earn

man go to forest to find some food but he was always busy to see all the world and explored it more
she worked whole day she washing, cooking, child caring, farming, peting, water fetching and more
when man came with little food he earned by exploring the world
she was the happiest one to know how hard her man has worked
she ask him to take a rest after they had some talk, drink and food
but he never ask her what she had done and he never in that of mood

she knew she has to manage it herself with out asking him to do so
becoz he already say no to GOD he never can organise manage the same though
she know she is not gaining anything except the pain
but she is happy when he loved her for his own fun gain
she never complaint it as she knew she can't complaint to anybody
she herself took initiative to be manager she ask him when he is ready

but he never ready to be asked even when he is to be asked he said
he is not here to do all these things he has to be in that outside world
he said to her that she is gentle, she is beautiful she has to be in his carness
there is nothing in outside world for her as he knew it is nothing a selffishness
he doesn't want to loose his freedom, his enjoyment, his adventuresness
he just say to her that she is too soft, gentle and tendered to be seen all that harshness

Is really a woman is too weak as she looked
No she is much stronger in inner as she tooked
GOD knows what she faced what she has done
since from starting She is the first manager paid by none

Monday, March 9, 2009

मसककली (part 3)

क्षितिज और सीमा अखबार में गुमशुदा लोगो में शिल्पा की फोटो ढूंढ रहे थे....उनकी शादी को अभी एक हफ्ता ही हुआ था। विदाई के समय जो कुछ हुआ उनके तो होश ही उड़ गए थे जब उन्हें पता चला की शिल्पा कहीं नही मिल रही है। बहुत ढूँढा पर नही मिली...फिर शिल्पा की एक दोस्त ने बताया की वो किसी से फ़ोन पे बात कर रही थी। और बात के गई है की वो थोडी देर में आ जायेगी। पर तब से उसे इतने दिन हो गए वो लौटी ही नही। शादी के बाद के सारे functions cancel कर दिए गए।

ting tong....ting tong.... घंटी बजी क्षितिज के मामा ने दरवाजा खोला...."आईये इंस्पेक्टर साहेब.....कुछ पता चला उस अनिल का...कहाँ है वो....पकड़ में आया वो...शिल्पा उसी के साथ है ना.... ठीक है न शिल्पा..."
इंस्पेक्टर: "देखिये हम लोग बहुत कोशिश कर रहे है शिल्पा को ढूँढने की.....और रही अनिल की बात तो अनिल भी दो दिनों से घर नही आया है ऐसा उसका मामा का कहना है....और अभी हमें एक लाश मिली है... अनिल के मामा को बुलाया है.....वो अनिल की लाश हो सकती है....."

क्षितिज: "तो आप यहाँ क्यूँ आए है...पता कीजिये की वो अनिल की लाश है की नही...क्या शिल्पा सच में उसी के साथ थी .....आखिर शिल्पा कहाँ है....." क्षितिज रोने ही लगा...सीमा ने उसे संभाला...और मन ही मन सोचा शुक्र है माँ अपने कमरे में सो रही है। पहले ही कितना गहरा शोक लगा है उन्हें। यह सब सुन के तो उनकी और हालत ख़राब हो जायेगी।

इंस्पेक्टर: "देखिये हम लोग शिल्पा के कॉलेज में उसके और दोस्तों से पूछ ताश कर रहे है....और इधर शिल्पा को जगह जगह ढूँढा जा रहा है। अपने उसकी गुमशुदा का इश्तहार(advt) भी अखबारों में दे दिया है.... इधर अनिल के मामा भी परेशान है। वो भी पूरा सहयोग दे रहे है....अनिल की फोटो भी जगह जगह लगी जा रही है।"

क्षितिज के मामा: "इंस्पेक्टर वो सब हम लोगो को नही पता बस आप हमारी बिटिया को ढूंढ कर वापस लाईये..और मीडिया में यह सब बातें नही आने दीजिये.... यहाँ मीडिया में न्यूज़ देख देख कर और हम लोगो की हालत ख़राब होती है...पता नही क्या क्या कहानी बना देते है.....हमारी बेटियाँ ऐसी नही थी...वो बहुत होंन्हार होशियार और सुशिल लड़की थी....वो किसी के साथ नही भाग सकती...उसके कई सपने थे...डॉक्टर बनाना चाहती थी...अपने पापा का नाम रोशन करना चाहती थी..."

इंस्पेक्टर: "हाँ हम जानते है कॉलेज में भी वो सबकी चाहिती है। सब यही बोल रहे है....आप फ़िक्र न करे हम लोग मीडिया में यह सब नही आने देंगे। बस आप मुझे उसकी स्कूल की कुछ सहेलियों या दोस्तों के बारे में थोड़ा और कुछ बताइए"

कुछ पूछ ताश के बाद इंस्पेक्टर चले गए....पूरा दिन बस इसी इंतज़ार में बीत गया की कोई ख़बर आयेगी...शाम को इंस्पेक्टर का फ़ोन आया की वो लाश अनिल की ही है। सब के सब दंग रह गए थे कहीं सच में तो शिल्पा ने उनसे सब कुछ छिपा नही रखा था...सीमा सोचती रही....कहीं अनिल को सचमुच में तो शिल्पा नही चाहती थी....नही नही अगर ऐसा कुछ होता तो ज़रूर शिल्पा उसे बताती.. आखिर सीमा शिल्पा की दोस्त जो बन गई थी....सीमा और शिल्पा दोनों एक दुसरे से कुछ नही छिपाते थे......अरे सीमा तो कभी कभी क्षितिज से की हुई बातें भी शिल्पा को बता देती थी...फिर शिल्पा उस से क्यों सब छिपाएगी....मगर शिल्पा उसकी छोटी ननद है। हो सकता है शिल्पा को सब बताते हुए शर्म आती हो क्यूंकि सीमा उसकी होने वाली भाभी थी....ज़रूरी तो नही की वो सब कुछ सीमा को और सीमा सब कुछ शिल्पा को बताये...सीमा के मन में न जाने क्या क्या विचार आ रहे थे...की अचानक क्षितिज की आवाज़ ने जैसे उसे गहरी कुए से बाहर खीच लिया हो।

क्षितिज: "सीमा मुझे माफ़ कर दो...."
सीमा: "ये तुम क्या कह रहे हो क्षितिज"
क्षितिज: "नही मुझे बोलने दो....शादी के बाद से ही एक भी पल मैंने तुमको एक भी खुशी नही दी...तुम्हारे कितने अरमान होंगे...तुम्हें कितने सपने देखे होंगे शादी को ले कर...reception को लेकर... honeymoon को लेकर...मुझे माफ़ कर दो....बस एक बार सब ठीक हो जाए...फिर मैं तुम्हे तुम्हारी सब खुशियाँ लौटा दूंगा॥"
सीमा: "क्षितिज मैं तुम्हारी पत्नी हूँ....मैंने तुमसे शादी की है....जीवन भर साथ निभाने का वादा किया है। और जो कुछ हुआ है सब के सामने हुआ है...सभी जानते है की क्या हुआ है....और क्या शिल्पा मेरी कुछ नही है.....क्या मैं उसकी कुछ नही हूँ....सब कुछ गडबडा गया है...माँ की हालत भी बिगडती जा रही है....जब सब ठीक हो जाएगा तब हम अपने बारे में सोचेंगे...अभी तो हम लोगो को शिल्पा और माँ के बारे में सोचना है....."

दो दिन बाद ही इंसपेक्टर ने बताया की अनिल की फोटो देख कर किसी ने उन्हें फ़ोन किया था....और उनके बताये पते पे जाने पे उन्हें शिल्पा मिल चुकी है...सभी ने गहरी साँस ली...और पुलिस स्टेशन चल दिए...शिल्पा से मिलने....

पुलिस स्टेशन में इंसपेक्टर ने बताया की शिल्पा को मेडिकल टेस्ट के लिए ले जाया गया है....अगले दिन तक उसे वही रहना है.....पर शिल्पा की माँ तो जिद्द ले के बैठ गई थी की उसे शिल्पा से अभी मिलना है...सीमा ने बहुत मुश्किल से उनको समझाया जहाँ इतना इंतज़ार किया है एक दिन और इंतज़ार कर लेते है....और फिर हमें ये तो पता है ना की वो सुरखित है....मिल गई है....ठीक है...वापस अपनों के पास वापस आने वाली है....खैर क्षितिज और उसके मामा के समझाने पे माँ मान गई...

to be continue....

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Tuesday, February 24, 2009

मसककली (part 2)

शिल्पा का कॉलेज का वो दूसरा ही दिन था. पहले दिन तो सिर्फ एक दुसरे का नाम ही जान पाए थे सब लोग....शिल्पा ने भी अपना नाम बताया और यह भी की स्कूल में सब उसे मसककली ही बुलाते थे। अभी वो अपनी नई नई सहेलियों से कॉलेज के मैदान में बैठी बातें ही कर रही थी की दुसरे विषय की क्लास के लिए घंटी बज उठी। सभी लोग उठे और बहुत उत्सकता से अपनी दूसरी क्लास की और चल दिए। शिल्पा भी उठी और चल दी। मगर चलते चलते उसकी एक
किताब जो उसके हाथ में थी नीचे गिर गई। वो उस किताब को उठाने के लिए झुकी ही थी की उसके पीछे से से एक आवाज़ आई....."excuse me.... सुनिए....माफ़ कीजियेगा....आपका रुमाल रह गया है...आप जहाँ बैठी थी ना...वहीँ रह गया....".....शिल्पा ने कई ऐसे किसे सुने थे जहाँ कॉलेज के लड़के लड़कियों को पटाने के लिए उल्टे सीधे तरीके अपनाते थे....यह तरीका भी उन्ही में से एक था....शिल्पा को ऐसे लड़को से सख्त नफरत थी.....जो अपनी पढ़ाई छोड़ कर लड़कियों के पीछे पढ़े रहते है...

शिल्पा को गुस्सा आया और पीछे मूड कर बिना कुछ देखे समझे बोल पड़ी....."देखिये....यह रुमाल मेरा नही है....और यह बेकार के लड़की को पटाने के टिप्स आप कहीं और जा कर इनका प्रयाग करे...यहाँ दाल नही गलने वाली समझे...." बिना रुके बिना देखे बस शिल्पा बोलती चली गई..."अभी मेरी क्लास है..मुझे देर हो रही है वरना अच्छे से आपको बताती की यह रुमाल किसका है.."...शिल्पा गुस्से से तनतनाती हुई क्लास की तरफ़ चल दी।

क्लास में भी शिल्पा थोडी देर तक यही सोचती रही....की कॉलेज में आके न जाने लोगो को क्या हो जाता है...पढ़ाई करने की जगह बेकार में लड़की या लड़के पटाने में अपना समय बरबाद करते है....खैर थोडी देर बाद उसका ध्यान क्लास में हो रही पढ़ाई की ओर चला गया....

घंटी बजते ही क्लास ख़त्म हुई तो उसकी एक सहेली ने बोला उसे भूख लगी है तो वो भी कॉलेज की कैंटीन की ओर चल दी। कैंटीन में खाते खाते मुह साफ़ करने के लिए उसे अपना रुमाल याद आया.... उसने अपना रुमॉल हर जगह देखा। बैग में, जींस की जेब में, किताबो के बीच में......फिर उसकी सहेली बोली...कहीं क्लास में ही तो नही गिर गया.....तभी शिल्पा को याद आया.... नही वो तो मैदान में ही रह गया था....जल्दी से कैंटीन से निकल कर वो वहीँ पहुंची... मगर वहां अब उसे वो लड़का कहाँ मिलने वाला था....और फिर उसे अपनी दूसरी क्लास में भी जाना था...सो वो चली गई...

सारी कक्षाएं(classes) ख़त्म होने पे शिल्पा बस स्टैंड पे खड़ी थी...धीरे धीरे उसकी सारी सहेलियों को बस मिल गई....अब वो अकेली बस स्टैंड पे खड़ी थी.....थोडी देर बाद....फिर वही पहचानी आवाज़ पीछे से आई...."यह आप ही का रुमाल है न.."...मगर इस बार पीछे से ही एक हाथ उसके सामने आया जिसमें उसका रुमाल था..शिल्पा अपना रुमाल भी पहचान गई....और शर्मिदा भी हुई। धीरे से पीछे देखा तो वही लड़का खड़ा मुस्कुरा रहा था...
"i am sorry..मैंने बिना रुमाल को देखे न जाने आपसे क्या क्या कह दिया था..."..शिल्पा के मुह से सिर्फ यही निकला.. "its ok"...उस लड़के ने मुस्कुरा कर जवाब दिया...तभी शिल्पा की बस आ गई...

बस में चढ़ने के बाद उसने उस लड़के को भी उसी बस पे चढ़ते देखा...पहले तो शिल्पा को थोड़ा शक हुआ..कहीं वो जानबुझ कर उसके साथ इस बस में तो नही चढा....फिर उसने सोचा नही फिर वो एक गलती नही करेगी....पहले ही उसे ग़लत समझ कर एक गलती कर चुकी है......वो यह सब सोच रही थी की उस लड़के ने बस कंडक्टर से कहा "मुझे जुहू तक की टिकेट दे दो...."....शिल्पा की सारी ग़लत फ़हमी दूर हो गई।

फिर वो लड़का शिल्पा की ओर देख कर बोला "आपकी कहाँ तक की टिकेट कटवाऊ"......
शिल्पा : "जी नही मैं खूब टिकेट ले लुंगी..."

शिल्पा ने भी अपनी टिकेट ली और फिर बोली.."आप जुहू में रहते है...."...
लड़का बोला "जी हाँ मैं यहाँ अपने मौसा मासी के घर रहता हूँ....और उनका घर जुहू में ही है..."
शिल्पा : "मेरा घर तो बस जुहू के चार स्टाप बाद ही है...."
लड़का : "आप कॉलेज में नई है...."
शिल्पा : "जी...आज दूसरा दिन था...और आप"....
लड़का : "दूसरा दिन...... तो बताईये आपको हमारा कॉलेज पसंद आया या नही....जी मुझे तो तीन साल हो गए है.....बस दो साल बाद मैं डॉक्टर हो जाऊँगा यह सोच कर भी हसी आती है..."
शिल्पा: "हाँ.....कॉलेज तो बहुत अच्छा है....सभी lecturers अच्छे है.. तो आप मेरे सीनियर है..फिर तो मदद हो जायेगी....क्या specialisation ली है आपने"
लड़का: "मेरा interest तो eyes specialisation में है...और आपका.."
शिल्पा: "मैं child specialist बनना चाहती हूँ"

तभी दोनों को एक खाली सीट मिल गई.....और दोनों और ज्यादा अच्छे से बात करने लगे....शिल्पा को वो लड़का कॉलेज की कई खटी मीठी बातें बताने लगा....शिल्पा को भी खूब मज़ा आ रहा था सब सुनने में...

इतने में ही उस लड़के का स्टाप आ गया....तब उनको पता चला की बातों बातों में समय कैसे बीत गया पता ही नही चला......सीट से उठते ही उस लड़के ने पुछा.."लो बातों बातों में हम एक दुसरे का नाम पूछना तो भूल ही गए..मेरा नाम अनिल है और आपका.."

"शिल्पा...." शिल्पा ने जवाब दिया...तभी बस स्टाप पे रुकी और...वो लड़का अनिल बस से उतर गया। बाकी के सफर में भी शिल्पा उसकी की खटी मीठी बातें याद आती रही.....वो बहुत खुश थी....कॉलेज के किस्से सुन कर बहुत excitemet feel कर रही थी।

"शिल्पा....ओ मेरी मसककली...." एक आवाज़ आई तो शिल्पा ने मुह उठा कर देखा..तो वो उसकी स्कूल की सहेली थी....किरन....."अरे किरन तू....तू इस बस में कैसे...".....

"हाँ मैं....और कोन....तुझे मसककली बुलाएगा... मैं तो बस अभी एक कॉलेज में अपनी फीस जमा कर के आ रही हूँ....तू बता तेरा तो admission भी हो गया है मैंने सुना है बहुत अच्छा कॉलेज है....और तेरे क्षितिज भिया की भी शादी होने वाली है"

"हाँ तुने ठीक ही सुना है...बस कॉलेज से ही आया रही हूँ और क्षितिज भइया की भी शादी 8 महीने बाद है...और सगाई दो महीने बाद..तुझे आना है....तुझे कार्ड देने आउंगी मैं तेरे घर पे...." शिल्पा बोली।

"चल फिर तेरे भइया की शादी के बाद तेरी बारी आ जायेगी.... कॉलेज में कोई लड़का देख लेना....तेरी लाइफ तो सेट हो गई कुड़िये.....मसककली.... वो क्या बोलते थे हम तुझे....हाँ.....

मैं एक मसककली (कबूतरी) हूँ बैठने को एक मुंडेर ढूंढती हूँ..
बस जो मेरे हर वक्त साथ रहे एक ऐसा कबूतर ढूंढती हूँ..

याद रखना इसे...और जल्दी से एक लड़का पता लेना....hehehehehe..."


शिल्पा: "क्या किरन तू फिर शुरू हो गई...स्कूल में भी तू ऐसे ही करती थी...एक मौका नही छोड़ती तू ना....न जाने कब सुधरेगी....तू बता तेरा admission कहाँ हुआ है।"

शिल्पा के स्टाप आने तक वो लोग बातें करते रहे...फिर शिल्पा घर भी आ गई....पर उसके chehre से वो मुस्कान अभी तक थी और अपने addmission और क्षितिज भइया की सगाई और शादी को ले के तो पहले से ही खुश थी और आज उसका दिन भी तो बहुत अच्छा जो गया था.... पर सच में वो उस शेर को कभी नही भूल पायेगी..जो अक्सर स्कूल में लोग उसे सुनते थे उसे छेड़ने के लिए.....

मैं एक मसककली (कबूतरी) हूँ बैठने को एक मुंडेर ढूंढती हूँ.....
बस जो मेरे हर वक्त साथ रहे एक ऐसा कबूतर ढूंढती हूँ.....


to be continue....

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Thursday, February 19, 2009

मसककली (part 1)

जिया और अनमोल बहुत खुश लग रहे थे। शिल्पा भी उन्हें शादी के जोड़े में देख बहुत खुश थी...पर फिर भी ना जाने उसके मन में एक उदासी सी थी.....वही उदासी जो उसके मन में बहुत सालो से है...

आज वो एक शादी में शामिल हुई है और एक दिन पहले भी वो एक ऐसी ही शादी में शामिल हुई थी। जहाँ उसने नही सोचा था की उसके साथ क्या क्या होने वाला था।


हाँ उसके भाई क्षितिज की शादी....वो क्षितिज से चार साल छोटी थी... उसकी लाडली बहन। क्षितिज पहले से ही उसे बहुत प्यार करता था। और शिल्पा और क्षितिज के पापा के स्वर्गवास होने बाद तो उनका रिश्ता और मजबूत हो गया था। अब क्षितिज एक भइया या एक दोस्त नही वो अब एक बाप की तरह शिल्पा की देख भाल करता था। अपने भाई को दुल्हे बना देख बहुत खुश थी शिल्पा। उसकी होने वाली भाभी सीमा भी बहुत ही अच्छी थी। शिल्पा से सीमा की बहुत बनती थी। दोनों सहेलियों की तरह तो कभी माँ-बेटी की तरह बातें किया करते थे। शिल्पा की माँ भी शिल्पा को बहुत प्यार करती थी। वो अक्सर कहा करती थी...."एक दिन मेरा बच्चा अपने पापा का नाम खूब रोशन करेगा।" हाँ शिल्पा के पापा का सपना था की वो एक बहुत बड़ी डॉक्टर बने.... अभी तो शिल्पा डाक्टरी के कॉलेज में ही गई थी। पहला ही साल था उसका।


खैर शादी के शोर शराबे में शिल्पा को बहुत मज़ा आ रहा था....सभी रिश्तेदार जो आए थे..घर खूब भरा भरा लग रहा था। उसकी माँ और उसके मामा जी ने सब काम संभाल लिए थे....तो अब उसे तो बस मस्तियाँ ही करनी थी। उसकी खूब सारी मस्तियाँ देख लोग बार बार उसे मसककली कह के बुलाते थे। वो थी ही मसककली जब देखो हवा में उड़ती रहती थी....चंचल, मस्त और हमेशा अपने में खुश रहने वाली लड़की। जो चाहे करती जो चाहे बोलती बिल्कुल खुले परिंदे की तरह। शादी के शोर शराबे में उसके इस खुले मिजाज़ और मस्तियों को देख कर तो लोग उसे और उसकी माँ को बोलने लगे "अब तो अगला नम्बर इस मसककली शिल्पा का ही है। भाई के बाद तो इसी की शादी होगी।" यह सब सुन कर शिल्पा को थोडी हसी भी आई और शर्म भी। उसकी माँ का जवाब आता "नही अभी तो इसकी उमर पढने की है..कहाँ शादी...नही अभी तो छोटी है..".....शिल्पा अपनी माँ की इस बात पर थोडी सी नाराज़ हो जाती.."क्या माँ इतनी भी छोटी नही हूँ मैं.."

गहरी सोच और यादों में डूबी शिल्पा को एक अनजानी कड़क रोबदार मर्दानी आवाज़ ने बाहर निकला....."माफ़ कीजियेगा... क्या यह रुमाल आपका है..." शिल्पा बिल्कुल सहम सी गई... फिर थोडी देर बाद जब शिल्पा थोड़ा अपने होश में आई तो वो आवाज़ फिर आई "शायद यह वहां रह गया था। आप ही का हैं ना। देखिये तो...आप का ही रुमाल है..ना।".....
शिल्पा ने सुना तो पाया आवाज़ पीछे से आ रही थी...वो मुडी और उसने देखा उस का रुमाल लिए एक हाथ उसकी तरफ़ बढ़ा हुआ था। शिल्पा ने अपना रुमाल पहचान लिया था। तो उसने शुक्रिया बोल के रुमाल ले लिया। रुमाल लेते हुए उसका हाथ उस हाथ को छु गया...उस छुवन से वो गबरा सी गई और बिन उस आदमी की और देखे वापस मूढ़ कर चल पड़ी.....पता नही उसे क्या हो गया था.....चलते चलते वो फिर सोच में डूब गई.....

मन ही मन सोचने लगी...कई सवाल मन में उठ रहे थे। ऐसा उस के साथ पहले भी हुआ है..जिसे वो कभी भूला नही पायी थी.....और शायद ना पायेगी...वही उसका रुमाल खो जाना और किसी अनजान शख्स का रुमाल वापस करना...और फिर हमेशा के लिए उसकी ज़िन्दगी का बदल जाना......... जो उसने सोचा नही था उसे अपनी ज़िन्दगी में इतना सब कुछ ..इतनी जल्दी एक के बाद एक इतने भयानक हादसों को उसे सहना पड़ेगा..वो भी इतनी छोटी उमर में...

to be continue....
Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Tuesday, January 6, 2009

प्रिय पाठकों

प्रिय पाठकों (readers)

मैं आज अपने सभी पाठकों को तह दिल से अपना बहुत बहुत आभार प्रकट करना चाहती हूँ। मेरी दोनों नारी जीवनों के उपर लिखी गई कहानियो को खूब सराहा गया। सबने उसे बड़ी ही प्रेम भावः से स्वीकार किया। मैं जानती हूँ की सीमा और जिया जैसे पात्रों को यहाँ मेरे पाठकों ने खूब पसंद किया है। उनके इस प्यार और इस सहयोग के लिए मैं और मेरी कहानियो के पात्र बहुत बहुत प्रसन्न है। मैं जानती हूँ मेरे कई मित्र(पाठक) मेरी इस बात को नही मानेंगे और मेरी इस प्रसंता को प्रकट करने की छोटी सी कोशिश को सह भावः से नही स्वीकारेंगे। मेरी इस उपलब्धि को वो मेरे ही लेखन को महान बता कर बचने की भर पूर कोशिश करेंगे। जबकि सच तो यही है की लेखक अपने लेखों को तभी अच्छे से जान सकता है जब वो अपने लेखों को अपने पाठकों की नज़र से देखे। और जब मैंने अपनी कहानियो की प्रसंता आप लोगो के प्यार भरे comments में देखी तभी सच मानिए मुझे अपने ही लेखों से और प्यार हो गया। मेरे हर लेख को अपने सहर्ष स्वीकारा है। और अब यही उम्मीद करती हूँ की इस लेख को भी आप अपना प्यार देंगे।

जैसा की आप सबको याद होगा... मेरी दो कहानियाँ "nimmo bua" और "जीवनसाथी" जिनको अपने अपना बहुत प्यार दिया। उनके प्रमुख पात्र "सीमा" और "जिया" को भूले नही होंगे यही उम्मीद करती हूँ। क्योंकि मेरी अगली कहानी भी एक ऐसी ही नारी की है। "शिल्पा" जी हाँ...शिल्पा जिया के साथ उसके हॉस्टल में रहने वाली लड़की की कहानी। शिल्पा कोई और नही बल्कि सीमा की ननद है। जी हाँ क्षितिज की बहन है शिल्पा। यह कहानी जब से शुरू है जब शिल्पा की ज़िन्दगी में सीमा और जिया दोनों में से कोई भी नही था। जी हाँ.....जब उसकी जिंदगी में उसके माँ-बाप और एक बड़ी भाई के इलावा कोई भी नही था। उसका भाई क्षितिज भी उस से 4 साल बड़ा होने के कारन उसकी सभी उलटी पुलती बातों को नज़र-अंदाज़ करता था। छोटी होने की वजह से वो सबकी लाडली थी। खेर अभी मैं शिल्पा की कहानी शुरू नही करने वाली..पर हाँ जल्द ही करुँगी। उम्मीद है आप उसे भी उतना ही प्यार देंगे जितना अपने सीमा और जिया को दिया है। बस थोड़ा इंतज़ार करिए। जल्द ही वो कहानी मैं आपके समक्ष पेश करुँगी।

धन्यवाद

आपकी प्रिय लेखिका (कहानी लिखने को अग्रसर है)

हेमा

Friday, January 2, 2009

Why

When I was sitting and waiting for you to enter in my life,
you were busy in talking with someone other girl...
but now I am stand up and ready to go forward in my life,
then why you want to come to near me...

When I was always dreaming about you and myself,
you were planning new life with someone else...
But now I am wake up and stop thinking about you,
then why you starting dreaming about me...

When I was ready to give you anything whatever you say,
you said you knew wat you want and you were chasing that only..
But now I already know that there is nothing I really can give you,
then why you want one more chance from me...

When I was expecting that you will understand my love signs,
you were not even look and noticed those signs....
but now I am stopped giving those signs ans signals,
then you seeing those signs by making things of yourself...

Wednesday, December 24, 2008

On this Christmas...New Story (Small Santa)

Well first of all I want to wish some special people...

Atal bihari Vajpayi ji-- Happy Birthday (25th Dec)(going to be 84 years..wowwwwwww....gr888 naaa..amazing..wonderful poet.....)(ek poetess dusre poet ko Live Long Life wish karti hai)

Gurpreet Singh(my friend) Happy Birthday (25th Dec)
Kamlesh(my aunt---buaji) Happy Birthday(25th Dec)
Arun(my cousin) Happy Birthday(in advance)(26th Dec)

n to all my readers......Merry Christmas..to all of you.....




well on this christmas I want to type some story on a child...a poor boy....I wrote this story(which i think opt for the today-christmas eve) in my school time..I got inspiration when I saw a puppy died on road by accident...that time I was not able to found out the opt title for this story...but now in my mind a title is there..i.e. Real Santa of a small Puppy

Is this title opt or not i don't know plzz you help mee out here..to find right/opt title for this story..plzz suggest me some right titles for this story.......

देव एक middle class का सीधा साधा 17 साल का लड़का था। उसके पापा एक सरकारी दफ्तर में छोटे से कर्मचारी थे। उसके घर की माली हालत ठीक न होने के कारन देव कभी भी अपना मनचाहा कोई भी सामान नहीं खरीद पाता था। उसका भी मन करता था की वो दुसरे लड़को की तरह अच्छे-अच्छे नए-नए कपड़े पहने जो की नए ज़माने के फैशन के हो। वो भी दुसरे लड़को की तरह खूब सारी मस्ती करना चाहता था। उसे भी सुंदर सुंदर नयी नयी चीज़ें चाहिए थी। एक बड़ी सी सड़क के किनारे गुमसुम सा सोच में डूबा हुआ देव..मन ही मन अपनी किस्मत को कोस रहा था। तभी उसका ध्यान एक तेज आती bike की ओर गया। bike बहुत जोर से आती हुई देव के पास से गुजरी एक बार तो देव भी डर गया था कि यह क्या हुआ। फिर जब bike चली गयी तो फिर सोचने लगा। मेरे पास भी bike होती तो मैं भी थोडा सा स्टाइल में रहता। फिल्मी हीरो की तरह bike चलाता। वोह मन ही मन अपने आपको bike चलते हुए देखने लगा। फिर दो मिनट के बाद फिर उसे वही bike की आवाज़ आई जो की इस बार दूसरी तरफ से आ रही थी। इस बार bike की speed कम थी। bike पे बैठा लड़का लगभग देव की उम्र का ही दिख रहा था। उसने नए फिल्मी हीरो की तरह designer shirt और jeans पहनी हुई थी। उसने इस शाम के समय भी काला चश्मा पहना हुआ था। देव को पता था उस काले चश्मे को बड़े पैसे वाले लोग Goggles या फिर sunglasses कहते है। मगर देव के दोस्त तो उसे धुप का चश्मा ही बुलाते थे। देव यह भी जनता था की उस लड़के ने वो धुप का चश्मा स्टाइल मारने के लिए ही पहना हुआ है वरना यहाँ धुप जैसा कोई मौसम नहीं था। शाम हो चुकी थी। वो bike वाला लड़का एक नयी फिल्म का गाना गुनगुनाता bike चला रहा था। बीच बीच में सीटियाँ भी मार रहा था। वो bike फिर से एक बार मूड कर वापस आई। इस बार वो लड़का लहरा लहरा कर bike चला रहा था। देव उसी को ध्यान से देखने लगा। bike फिर से दूर गायब हो गयी।

फिर अचानक देव को किसी कुत्ते की आवाज़ आई। उसने देखा की ठीक उसके सामने कुछ ही दूरी पर एक कुत्तिया सड़क के उस और मुह करके भौंक रही थी। देव ने उस ओर देखा जहाँ वो मुह करके भौंक रही थी तो देव की नज़र सड़क की उस और खड़े छोटे से पिल्ले(puppy) पे पड़ी जो की सड़क पार करने से डर रहा था। शायद उसकी माँ उसे इस पार आने को कह रही थी। गाडियाँ भी सड़क पे आ जा रही थी जिसकी वजह से वो पिल्ला डर रहा था। देव ने सोचा क्यों न उस पिल्ले को उसकी माँ के पास पंहुचा दूँ। तो देव सड़क पार करने लगा। तभी उसने देखा सड़क clear होते ही हिम्मत करके वो पिल्ला कुछ आगे बढ़ा और सड़क पार करने लगा। तभी देव ने देखा की वो bike वाला लड़का फिर से तेजी से bike ले कर आ रहा है। देव उस पिल्ले की और भागा। bike की speed बहुत तेज थी। देव ने bike की speed की परवा किए बिना पिल्ले को बचा लिया। पिल्ला उसके हाथो में ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहा था। उसके मिमयाने की आवाज़ से साफ़ समझ आ रहा था की वो कितना डर गया था। देव ने उसके धड़कते दिल को महसूस किया जो जोरो से धड़क रहा था। कु कु कु कर वो अपनी माँ को बुला रहा था। देव ने उस पिल्ले को उसकी माँ के पास पंहुचा दिया जो की अपने बच्चे के लिए बिलख सी रही थी।

तभी देव को तालियों की आवाज़ आई। उसने देखा सड़क के दोनों किनारे कुछ लोग खड़े हो कर उसके लिए तालियाँ बजा रहे थे। सब देव की तारीफ किए जा रहे थे और साथ ही साथ उस bike वाले लड़के को बुरा भला कह रहे थे। देव फिर अपनी रहा पे चल दिया और फिर से सोचने लगा की उस बइके वाले लड़के से अच्छा तो मैं हूँ। वो चाहे बड़े घर का लड़का हो पर देव तो बहुत अच्छा लड़का है। उसने एक जीव की जान बचायी है। वो bike वाला लड़का अपनी जवानी के नशे में चूर है और उस नशे में वो क्या कर रहा है उसे भी नही पता। आज वो एक जीव की जान ले लेता। और जबकि देव भी जवान है पर उसे पता है की वो क्या कर रहा है। उसने आज एक बहुत अच्छा काम किया है। उसके पास पैसा न हो पर अच्छे संस्कार है। उसके पास अच्छा पहनने को, अच्छा खाने को, स्टाइल मारने को भले ही कुछ नही पर उसके पास अच्छी सोच, दुसरो के लिए भलाई, बहादुरी,तेज दिमाग और एक बड़ा अच्छा दिल है। वो चाहे फिल्मी हीरो की तरह दिखता न हो पर असल ज़िन्दगी में वो एक हीरो ही है। असली हीरो। जिसने अपनी बहादुरी से एक नन्हे से पिल्ले की जान बचायी है। तभी देव ने फ़ैसला किया आगे से वो कभी अपने को कम नही समझेगा और न ही कभी ख़ुद की तुलना उन लड़कों से करेगा।


THE END

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Note:--यह कहानी मैंने उन तेज bike चलने वालो को एक सीख देने के लिए लिखी थी की ज़रा सी मस्ती, ज़रा सा स्टाइल, लड़कियों को दिखाने/पटाने का चक्कर में वो न जाने कितने मासूम जीवों की जिंदगियां सड़क दूर-घटनाओं ख़त्म कर देते है। और देव जैसे लोग सचमूच के देवता बन कर जीवों की जिंदगियां बचाते है। सच में देव उस puppy और उसकी माँ के लिए एक देवता, एक मसीहा, एक Santa बन कर आया था। या फिर उसे देवता/Santa ने अपना दूत बना कर उसे वहां भेजा था।

Note:--एक सीख और मिलती है इस कहानी से की हमें कभी भी अपनी सभ्यता अपने संस्कारों को नही भूलना चाहिए। दुसरे लोगो की हाव भावः देख कर या उनके चाल ढाल देख कर हमें कभी बिना सोचे समझे उन जैसी नक़ल नही करनी चाहिए। दुसरो की सही आदतों को अपनाना चाहिए फैशन और स्टाइल के नाम पर कुछ भी ऐसे ही नही अपनाना चाहिए।

Sunday, December 14, 2008

जीवनसाथी (part 6) (last part)

अनमोल जल्दी जल्दी तैयार हो रहा था आज उसकी कॉलेज कि आखिरी परीक्षा जो थी। रोज़ जिया को शिल्पा के यहाँ से ले कर कॉलेज जाना उसे अच्छा लगता था। अनमोल ने जिया को जब पहली बार देखा था तब ही मानो उसे दिल दे दिया था। वो जिया को तभी से बहुत प्यार करने लगा था। वो जिया की जितनी इज्ज़त करता था उतना ही उस से प्यार भी करता था। कई बार उसने जिया को बताने की कोशिश भी की मगर कह नही पाया। रोशन को गए लगभग ढेड (1+1/2) साल हो चुका था फिर भी वो जिया से कुछ नही बोल पाया था। हर बार नए तरीके से बोलने की अच्छे से तयारी कर के जाता। पर जिया के सामने जाते ही सब भूल जाता। आज भी उसने जिया को बताने के लिए नए तरीके से तयारी की थी। उसका प्लान था की परीक्षा के बाद वो जिया को बाहर ले जाएगा और वहां सब बोल देगा।

परीक्षा ख़त्म होते ही अनमोल जिया से मिला और उसे काफ़ी के लिए पुछा। Cafe coffee day पहुच कर अनमोल ने जिया से पुछा "जिया परीक्षाएं ख़त्म हो गई है। तो तुम्हारा आगे क्या इरादा है।""ह्म्म्म.... सच कहू तो मैं समाज के लिए कुछ करना चाहती हूँ। तुम्हे तो याद होगा वो इच्छा नाम की वो लड़की जो हमारे कॉलेज में वर्कशॉप करने आई थी। जिनसे मैंने बात भी की थी। बस अब उन्ही के साथ जुड़ना चाहती हूँ। ....ओह !! मैं तो भूल ही गई। अनमोल मुझे जल्दी निकलना होगा। तुम मुझे जल्दी मेरे ऑफिस के पास जों गिफ्ट वाली शॉप है वहां छोड़ दोगे प्लीज़।"

अनमोल समझ नही पाया की जिया को इतनी जल्दी क्यों है। इसलिए उसने पूछ ही लिया "वहां क्या काम है। किसी के लिए गिफ्ट लेना है क्या।" "नही नही...वो अब तुमसे क्या छुपाऊँ....का मुझे रोशन का फ़ोन आया था। वो मुझसे मिलना चाहता था। और मैं तो कल ही इच्छा जी के सामाजिक कामो के लिए अलग अलग छोटे छोटे शहरों जाने के लिए निकल रही हूँ। फिर ना जाने कब वापस आऊं। आऊं भी की नही। तुम्हे तो पता है यह सामाजिक काम ऐसे ही होते है। हमें अलग अलग जगह जाकर अनपढ़ लड़कियों को शिक्षित करना है। उन्हें पढ़ा लिखा कर उनकी जिंदगियाँ बदलनी है। उन्हें बड़े शहरों जैसी सोच देनी है। और भी बहुत से काम है। मैं तो बहुत ही उत्साहित हूँ। मगर रोशन की जिद्द है मिलने की तो मैंने उसे वहां मिलने के लिए बुलाया है।" जिया ने अनमोल को बताया और उसे हाथो से पकड़ कर उसकी bike की ओर ले गई।

अनमोल के अरमानो को फिर से किसी की नज़र लग गई थी जैसे। उसे याद आ गया फिर वहीँ पल जब उसे पता चला था की रोशन जिया से और जिया रोशन से प्यार करती है। मगर उस समय वो प्यार नया नया था। वो लोग सिर्फ़ दोस्त ही बन पाये थे। मगर आज आज तो अनमोल को बहुत ही बुरा लग रहा था कि यह सब उसी के साथ क्यों। क्यों बार बार उसकी किस्मत उसे रुलाती है। जिया हर बार उसके इतने करीब आ के दूर हो जाती है।

अगले दिन जब अनमोल जिया से मिलने उसके घर गया तो उसे शिल्पा मिली। शिल्पा को ऑफिस के लिए देर हो रही थी। इसलिए उसने अनमोल को इतना ही बताया की जिया अब वहां नही रहती वो सुबह ही इच्छा के साथ चली गई थी। अनमोल को लगा अब उसके सभी सपने जैसे टूट से गए हो।

"क्यों जिया मैडम कहाँ ख्यालों में खोयी हुई हो।" जिया ने जैसे ही यह सुना उसे लगा की यह आवाज़ उसने कहीं सुनी हुई है। उसने अपनी पुरानी यादों से निकल कर पीछे देखा तो बाहें फैलाये शिल्पा खड़ी थी। हाँ आज शादी के इस पावन दिन में उसे पुराने दोस्तों की याद तो आ ही रही थी। मगर किसी का कुछ पता नही होने के कारण वो किसी को बुला ही नही सकी। शिल्पा को उसी पते पे शादी का कार्ड भेजा था। उम्मीद नही थी वो आएगी। जिया शिल्पा को देखते ही उस से लिपट गई। "शिल्पा...ओ ...शिल्पा...मुझे खुशी हुई तुम आई।"
"बहुत मुबारक हो। आज का दिन हर लड़की के लिए एक यादगार दिन होता है। तुम्हारी इस खुशी में मुझे तो शामिल होना ही था।" शिल्पा ने कहा। "इन पिछले 2 सालो में जबसे तुम गई हो तुम्हारी कोई ख़बर ही नही आई। कहाँ हो, कैसी हो, क्या कर रही हो। न कोई चिठ्ठी न कोई फ़ोन। हमको तो जैसे भूल ही गई थी तुम।" शिल्पा ने जैसे जिया से शिकायत सी की थी।

"नही ऐसी कोई बात नही है तुम लोगो को कैसे भूल सकती हूँ मैं। ख़ास कर तुम्हे और अनमोल को। तुम दोनों को इन सालो में बहुत याद किया। और आखिरी दिन जब तुमने मुझे बताया था की अनमोल ही मेरे लिए ठीक लड़का है वो दिन तो मेरे लिए जैसे बहुत मायने रखता है। उस दिन मैं समझ नही पायी थी की तुम क्या कहना चाहती थी। पर आज समझती हूँ। सच में अनमोल ही मेरे लिए सही लड़का था। हर बार मैं उसकी भावनाओं को समझ नही पाती थी। पर अब मुझे लगता है की मैं भी उस से बहुत प्यार करने लगी हूँ। उसके पास न होने से जो खालीपन मुझे लगता है मैं तुम्हे नही बता सकती शिल्पा। वो मुझसे प्यार करता था। मैं जानती थी। हाँ जानती थी मैं और जानते हुए भी मैंने उसे कभी सुनना ही नही चाहा। क्योंकि उस समय सिर्फ़ रोशन के कुछ और सोचती नही थी। समझती नही थी। लेकिन आज इतने सालो से अनमोल से दूर रह कर अपनी जिंदगी में उसकी एहमियत समझ गई हूँ मैं। आज प्यार को समझ गई हूँ मैं। रोशन के ख्याल को दूर करने के लिए ही मैं उस से आखिरी बार मिली थी। उसी के बाद मुझे अनमोल का प्यार नज़र में आने लगा। और आज जब मेरी शादी किसी और लड़के से हो रही है जिसे मैंने देखा तक नही है तो मुझे रह रह कर अनमोल की ही याद आ रही है। शिल्पा तुम सही थी की अनमोल मुझसे प्यार करता था और मैं उसे बस दोस्त ही समझती थी। और आज जब मैं उस से प्यार करती हूँ तो वो मेरी ज़िन्दगी में है ही नही।" बोलते बोलते जिया रोने लगी थी। शिल्पा ने उसे संभाला और गले लगा लिया। फिर थोडी देर उसने जिया से पुछा.."जिस लड़के से शादी हो रही है उसे देखा तक नही है मतलब तुम यह शादी किसी मजबूरी में कर रही हो जिया.....बोलो।"
"नही..ऐसी बात नही है शिल्पा..माँ और पापा ने मुझसे पुछा था..और उस लड़के से मिलने को भी कहा था। मगर मैंने ही मना कर दिया। जब लड़का मुझे नही देखना चाहता तो मेरे देखने से क्या फरक पड़ेगा। माँ और पापा ने उसे देखा है। उनकी नज़र में ठीक है यह रिश्ता यह शादी तो मैंने हाँ कर दी। हर बार मैंने अपनी ज़िन्दगी के लिए ग़लत फैसले किए है इस बार दुसरो को मेरे लिए कुछ फैसले करने दूँ। शायद वो लोग ठीक हो। ज़िन्दगी की नई शुरुवात दुसरो के किए फैसलों से...चलो अब इस तरह भी जी लिया जाए।" जिया ने बड़ी बेरुखी से कहा तो शिल्पा सोच में पड़ गई।

तभी अचानक जिया की मौसी वहां आई और जिया से बोली..."जिया खिड़की से बाहर देखो बारात आ गई है। जल्दी जल्दी...अपने दुल्हे को देख लो..अपने दुल्हे को घोडी चड़े देखना अच्छा होता है। चलो...." जिया को खिड़की की ओर ले गई उसकी मौसी।
बारात बहुत अच्छी थी। बहुत से लोग खुशी से नाच रहे थे। तभी अचानक जिया ने देखा की बारातियों में उसके सारे दोस्त शामिल थे। उसे कुछ समझ नही आ रहा था। वो सोच ही रही थी की उसका ध्यान शिल्पा ने इशारे से घोडी पे चड़े दुल्हे की ओर कर दिया। जिया ने दयां से देखा तो उसकी खुशी का ठिकाना ही नही रहा। उसे यकीन ही नही हुआ की जो वो देख रही है वो सपना है या कुछ और। दुल्हे बने अनमोल ने भी तभी खिड़की की ओर देखा और मुस्कुरा दिया। तभी शिल्पा कुछ सोच बोली..."ओह....अब समझी की क्यों लड़के ने तुझे देखने से मना कर दिया था। जिया अनमोल मुझे कुछ महीनो पहले ही मिला था तो मैंने उसे तेरे और रोशन के बीच हुई आखिरी मुलाक़ात के बारे में सब बता दिया था कि तुम रोशन से मिलने क्यों गई थी। तुम रोशन को अपनी ज़िन्दगी से पूरी तरह निकलने के लिए ही उस से आखिरी बार मिली थी। मुझे नही पता था कि अनमोल इतना सब कुछ प्लान कर लेगा।"
और फिर जिया कि शादी खूब धूम धाम से हुई। सभी दोस्तों नऐ मिलकर अनमोल और जिया के लिए खूब सारी शुभकामनाएं दी और खूब नाचे गाये। सच में एक यादगार दिन और एक यादगार शादी।

THE END
Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

जीवनसाथी (part 5)

अगले दिन शाम के 7 बजे अनमोल अपने नए घर की खिड़की पे खड़े कल शाम जिया और उसके बीच हुई बातचीत को समझने की कोशिश कर रहा था। रोशन उन दोनों को घर में छोड़ कर कुछ पार्टी का सामान लेने बाज़ार चला गया था। तब जिया ने अनमोल को बताया की जिया और रोशन अब एक साथ यहाँ रहने लगे है। जिसे लोग LIVE IN Relationship कहते है। जिया चाह कर भी किसी को नही बता पायी। बस शिल्पा को ही इस बारे पता है। जिया घर से जल्दी इसीलिए आ गई थी क्योंकि उसे लग रहा था की वो अब रोशन के बिना नही रह सकती। तब रोशन और शिल्पा ने उसे LIVE IN Relationship के बारे में बताया। शुरू में जिया को यह सब ठीक नही लगा था इसीलिए उसने मना किया। पर जब शिल्पा ने उसे समझाया कि रोशन उसे बहुत प्यार करता है और इस तरह के रिश्ते में कोई प्रॉब्लम नही है। यह तो आजकल आम बात है। जिया को भी रोशन की जिद्द के आगे झुकना ही पड़ा। जिया ने अपने घर वालो को भी नही बताया क्योंकि वो जानती थी की उसके घर वाले यह कभी इस बिन शादी के रिश्ते को स्वीकार नही करेंगे। फिर भी पता नही क्यों वो रोशन के साथ रहने लगी जहाँ सब उसे रोशन की पत्नी समझते है। जिया अनमोल से भी यही चाहती थी की वो यह बात अब किसी और को ना बताये। जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दे। न तो कॉलेज में किसी को बताये न ही यहाँ घर के आस पास किसी को बताये। रोज़ जिया को रोशन उसके ऑफिस से लेके घर आता था। मगर कल वो उसे शिल्पा के यहाँ से उसे ला रहा था। जिया शिल्पा के साथ कुछ खरीदारी करके आई थी इसीलिए उसके कपड़े बदले हुए थे। फिर रोशन के आते ही तीनो ने रोशन का लाया हुआ खाना खाया। इस बीच अजीब सी शान्ति थी। न तो अनमोल कुछ बोल पा रहा था और न ही वो लोग कुछ बोल रहे थे। कई दिनों तक अनमोल के मन में यही सवाल उठता रहा कि जिया रोशन के साथ सही मायनो में इस तरह रहना चाहती है। या वो इस रिश्ते से खुश है या नाखुश। या फिर डरी हुई है रोशन को खो देने के डर से। लेकिन जिया तो बोल रही थी वो रोशन के साथ बहुत खुश है। फिर भी अनमोल को बहुत अजीब सा लग रहा था कि कोई खुश कैसे रह सकता है जबकि वो इस खुशी को किसी और के सामने ही न जाहिर कर सके। चोरी छुपे किए हुए कामो में किसी को क्या खुशी मिलती होगी।

तीन चार महीनो बाद अनमोल जिया को लेने उसके घर गया। "जिया...जिया... जल्दी करो कॉलेज के लिए देर हो रही है। रोशन चला गया क्या...?" अनमोल ने जिया से पुछा जो कि पूरी तरह से तयार नही थी।"
हाँ बस पाँच मिनट दो अभी बाल बना के आती हूँ। जब तक तुम मेरा लंच बाँध दोगे क्या अनमोल। हाँ रोशन तो ऑफिस के लिए कबका निकल गया है।" जिया ने बोला। अनमोल जल्दी जल्दी जिया का खाना बाँधने लगा। जिया भी जल्दी से बाल बनाने लगी। "अनमोल जरा लंच को उस लाल बैग में रख दो। मैं sandle पहन लेती हूँ। " जिया ने अनमोल को अगला काम बताया। अनमोल करता क्या न करता चुप चाप लंच को लाल बैग में रखने लगा। अचानक उसकी नज़र लाल बैग के अंदर पड़ी। उस बैग में जिया के कपड़े भी थे। और साथ ही में एक बड़ा बैग और रखा हुआ था। अनमोल कुछ समझ पाता इस से पहले ही जिया कि आवाज़ उसके कानो तक पड़ी। "चलो मैं तयार हूँ।....ओह !! हाँ आज सामान कुछ ज्यादा है। वो मुझे शिल्पा के यहाँ जाना है कुछ दिनों के लिए।"अनमोल यह सुनकर थोड़ा परेशान हो गया। उसकी परेशानी देख जिया फिर बोली "रोशन के चाचा कल यहाँ आ रहे है तो रोशन ने मुझे बोला कि मैं जब तक शिल्पा के यहाँ रह लूँ। अब जल्दी चलो वरना देर हो जायेगी। पहले यह सामान शिल्पा के यहाँ भी छोड़ना है। शिल्पा भी इंतज़ार करती होगी।....चलो चलो न।" जिया अनमोल को खीचते हुए बाहर ले गई।

दो दिन बाद जब अनमोल ने अपने घर से बाहर देखा तो उसे रोशन के घर के सामने बहुत सारे लोगो की भीड़ नज़र आई। अनमोल बाहर आया तो उसे पता चला कि रोशन ने कई महीनो से मकान मालिक के समझाने के बाद भी घर का किराया नही दिया है इसीलिए उसके मकान मालिक ने पुलिस बुलाई है। अनमोल ने बहुत बीच बचाव करने कि कोशिश कि मगर मकान मालिक मान ही नही रहा था। रोशन बोल रहा था कि उसकी नौकरी लग गई है और अब सब ठीक हो जाएगा मगर मकान मालिक पर कोई भी बात असर नही कर रही थी। अनमोल के पास भी कुछ खास रकम नही थी जिस से वो मकान मालिक का मुह बंद कर सके। पुलिस रोशन को वहां से ले गई।

अगले दिन अनमोल जिया के साथ रोशन को छुडाने पुलिस स्टेशन भी गए मगर वहां पता चला कि रोशन के घरवाले सुबह ही आ कर उसे ले गए। वापस घर आकर देखा तो रोशन वहां भी नही था। जिया का रो रो कर बुरा हाल हो रहा था। काफ़ी देर से उसे फ़ोन भी लगाया मगर रोशन का फ़ोन तो बंद था। पूरा दिन रोशन को ढूढ़ते ढूढ़ते जब वो दोनों थक गए तो अनमोल ने जिया को शिल्पा के यहाँ छोड़ दिया और ख़ुद भी घर आ गया। रोज़ वो पड़ोसियों से रोशन के बारे में पूछता कि वो आया था सामान लेने तो सब उसे यही कहते कि उस दिन पुलिस के साथ ही उसे देखा था।


to be continue....
Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.


Saturday, December 13, 2008

जीवनसाथी (part 4)

अनमोल को नही पता था की उसे मौका इतनी जल्दी मिल जाएगा...जैसे ही उसने जिया को अकेले लाइब्रेरी की ओर जाते देखा वो उसकी ओर चल दिया.."जिया रुको मुझे भी लाइब्रेरी जाना है।" अनमोल बोला और जिया के साथ साथ चल दिया। "जिया कल मैं नही आऊंगा कॉलेज" अनमोल ने जिया को बताया। "क्यों...कल ना आने की कोई खास वजह...." जिया ने अनमोल से पुछा। "वो मेरे मामा जिनके यहाँ मैं रहता हूँ उनकी posting किसी दुसरे शहर हो गई है। तो अब मुझे अपने लिए नया मकान लेना होगा रहने के लिए। आज सुबह ही मामा ने मकान देख लिया है। खैर मकान तो मिल गया है बस कल वहां अपना सामान जमाना है।" अनमोल ने जिया को बताया। जिया ने मुस्कुरा के अनमोल को देखा। "जिया क्या बात है आज तुम उदास उदास सी लग रही हो। कोई बात है तो मुझे बता सकती हो।" अनमोल ने जिया से सीधे सीधे ही पूछ लिया। जिया थोड़ा सा हिचकिचाते हुए बोली "नही..नही तो..मैं उदास उदास सी नही अनमोल ऐसा कुछ नही है...वो....वो...हाँ नौकरी भी करती हूँ ना तो बस थोडी सी थकान है और कुछ नही।"

अनमोल ने बहुत कोशिश की मगर जिया उसे कुछ नही बता रही थी। फिर अनमोल को लगा शायद कुछ ऐसा हो ही नही जैसा वो सोच रहा है जिया ठीक ही कह रही हो कि थकान की वजह से वो ऐसी लग रही हो उसे। या फिर ऐसा भी हो सकता है की वो अनमोल को बताना ही नही चाहती हो।

अगले दिन अनमोल ठीक सुबह 8 बजे अपने नए मकान के सामने अपना सामान लिए खड़ा था। ऑटो वाले को पैसे दे ही रहा था कि उसकी नज़र सामने वाले घर पर पड़ी। वहां उसने रोशन को अंदर जाते हुए देखा। उसने आवाज़ लगनी चाही पर रोशन अंदर जा चुका था। अनमोल ने सोचा पहले घर ठीक थक कर लूँ फिर सामने वाले घर में जा कर रोशन से मिल कर उसे surprise कर दूंगा। अनमोल खुश था कि उसके सामने वाले घर में कोई उसका जानने वाला ही रहता है।

करीब 8:30 बजे अनमोल घर से निकल कर सामने वाले हर की ओर चल दिया। वो उस और जा ही रहा था की उसने देखा की रोशन अपनी bike पर एक लड़की को बिठाये ले जा रहा है। वो सोच में पड़ गया की वो लड़की कौन हो सकती है। क्योंकि अनमोल जनता था की रोशन अकेला ही रहता है। उसके साथ और कोई नही था इस शहर में।

दिन भर अनमोल सोचता रहा। उसे कभी तो लगता की उसकी सोचने की शक्ति ख़त्म सी हो गई है। और कभी उसे लगता की वो जो सोच रहा है ऐसा क्या पता हो ही ना। शाम को करीब 4 बजे उसने कॉलेज जाने की सोची। वो जिया से मिलना चाहता था....सच का पता लगना चाहता था। वो कॉलेज के गेट तक पंहुचा ही था की उसे महक और दीपक दिखे। उनसे पूछने पे पता चला की जिया आज जल्दी ही कॉलेज से चली गई थी।

वापस घर आया तो अनमोल ने जिया को रोशन के साथ ही देखा। दोनों उस सामने वाले घर की और जा रहे थे। उन लोगो ने भी उसे देख लिया था। "अरे अनमोल तुम यहाँ कैसे ....कितनो दिनों बाद मिले..." रोशन बोला। अनमोल ने देखा की जिया ने वही कपड़े नही पहने हुए थे जो सुबह उसने रोशन के साथ बैठी लड़की को पहने देखा था। अनमोल को लग रहा था की वो दलदल के अंदर धसता चला जा रहा है। कोई कुए में उसे दखा दे रहा है।

जिया थोडी सी डरी हुई लग रही थी। "अनमोल तुमने घर कहाँ लिया है। आस पास ही है क्या।" जिया ने अनमोल से पुछा। "हाँ सामने वाले घर मेरा ही तो है।" अनमोल ने जवाब दिया तो जिया के डर में और गहरायी आ गई थी। "अरे वाह! यह तो बहुत अच्छा हुआ अब मुझे रोज़ रोज़ जिया को कॉलेज नही छोड़ना पड़ेगा। क्यों जिया अब तुम अनमोल के साथ रोज़ कॉलेज चली जाना।" रोशन खुश हो कर बोला।

"अनमोल तुम्हे बहुत कुछ बताना है चलो घर के अंदर आओ। ऐसा बहुत कुछ है जो तुम्हे नही पता है।" जिया ने अनमोल का हाथ पकड़ कर घर के अंदर आने को कहा तो अनमोल चल दिया क्योंकि उसे अपने बहुत सारे सवालों के जवाब भी तो चाहिए थे जिया और रोशन से।

to be continue....

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Friday, December 12, 2008

जीवनसाथी (part 3)

अपने कमरे को खुला पाकर जिया समझ गई थी की शिल्पा कमरे में ही है। शायद आज वो ख़ुद लेट हो गई थी। बहुत थक गई थी वो। कमरे के अंदर आते ही उसने अपना बैग एक ओर पटका और अपने बिस्तर पर अपने आपको ढीला छोड़ कर गिरा दिया। बिस्तर पे पड़ते ही उसे बहुत आराम महसूस हुआ। "क्या बात है जिया बहुत खुश लग रही हो। और आज इतनी देर कहाँ लगा दी मैडम ने। लाइब्रेरी में इतनी देर तक पढ़ रही थी क्या। या फिर रोशन के साथ कहीं लम्बी सैर करके आई हो।" शिल्पा जैसे उसे छेड़ रही थी। असल में तो जिया रोशन के साथ पूरा दिन घूम कर ही आई थी। उसका आज पूरा दिन बहुत अच्छा गया था।
"तो इसका मतलब तुमने रोशन को हाँ कर दी है। है ना !!...मैं जानती थी तुम रोशन को न नही बोल सकती। मैंने तो रोशन को बोला भी था कि वो बेकार में तुम्हारे जवाब की इतनी फ़िक्र कर रहा है। सभी जानते थे कि तुम हाँ ही बोलोगी।" शिल्पा का इतना बोलना था कि जिया ने उसे टोक दिया। "मतलब रोशन मुझे अपने प्यार का इज़हार करने वाला है तुम सबको पहले ही पता था। और मेरी दिल उसके लिए धड़कता है यह भी सब जानते थे।"
"हाँ... यह तो सब जानते है। कि तुम रोशन से बहुत प्यार करती हो। रोशन ने यह सब परसों ही बोलने का प्लान बना लिया था जब वो मुझसे मिला था। वो जानना चाहता था कि तुम उसके बारे में क्या सोचती हो। उसने मुझे भी बताया कि वो भी तुमसे प्यार करता है। तो मैंने ही बोला कि देर न करो जल्दी से जल्दी बोल दो।....तुम खुश हो ना जिया॥"
"हाँ!! बहुत खुश हूँ।" बस इतना बोल जिया सुन्हेरे सपनो में खो गई। और शिल्पा ने भी उसे और तंग न करने को सोचा। मगर शिल्पा कल ही जिया से एक पार्टी की उम्मीद तो कर ही रही थी।
"हेल्लो जिया.....कैसी हो यार। तुम्हारी तो परीक्षायों के बाद न कोई बात न ख़बर" महक जिया को कॉलेज में आते देख दूर से ही बोली। "हेल्लो महक मैं कहाँ गई हूँ यार तुम ही सब लोग कॉलेज की छुट्टियों में कहीं चले गए थे यार। मैं परीक्षायों के दो दिन बाद घर गई थी। और एक हफ्ते में ही वापस आ गई थी। वापस आ कर पता चला तुम सब शहर में ही नही हो।" जिया ने महक के साथ साथ क्लास कि ओर चलते हुए से महक से पुछा।
"हाँ मैं तो अपनी नानी के यहाँ चली गई थी। दीपक और टीना भी अपने अपने relatives के यहाँ। रहमान तो घूमने कहीं गया हुआ था। हमने सोचा तुम पूरी छुट्टियाँ अपने घर में ही बिताने वाली हो। अनमोल का भी कुछ अता पता नही है।" महक ने जिया को बताया। "हाँ अनमोल भी शायद अपने घर ही गया है।" जिया बोली।
"महक.....जिया .....महक....जिया...." पीछे से आवाज़ आई तो दोनों ने पलट कर देखा तो उन्हें नज़र आया। "कैसे हो रहमान...." जिया ने पुछा। "हाँ मैं अच्छा हूँ तुम लोग कैसे हो...तुम लोगो ने दीपक और टीना की ख़बर सुनी। वो लोग अब साथ साथ रहने लगे है। LIVE-IN you know.."
LIVE IN यह बात जिया ने पहली बार रोशन से सुनी थी। जब रोशन उसे अपने घर बुला रहा था साथ रहने के लिए। यह सब उसे बहुत अजीब लगा था इसीलिए जिया ने उसे मना कर दिया था। हालाकि शिल्पा ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की थी कि इसमें कोई बुराई नही है। मगर जिया यह करना ही नही चाहती थी। जिया यह सब सोच ही रही थी कि अचानक एक आवाज़ से वो चौक गई। "क्या बात है पूरी पलटन यहीं है....कैसे हो दोस्तों..." यह दीपक कि आवाज़ थी जो कि टीना के साथ आ रहा था। दोनों बहुत खुश नज़र आ रहे थे।
"जिया कैसी हो तुम और तुम्हारा वो कैसा है रोशन..." टीना ने उस से शरारती नज़रों से पुछा। "हाँ सब ठीक है। मैं यहीं पार्ट टाइम नौकरी करती हूँ। और रोशन भी नौकरी ढूंढ रहा है।" जिया ने जवाब दिया तो सबने उसे नौकरी के लिए बधाइयाँ दी।
तभी उनकी second year की पहली क्लास शुरू हो गयी। अनमोल भी दूसरी क्लास के ख़त्म होते ही आ गया। उसके आते ही सब बहुत खुश हुए। अनमोल भी सबसे मिलके खुश हुआ। मगर अनमोल को जैसे की पता चल चुका था कि जिया के साथ कुछ हुआ है वो उसे खुश नज़र नही आ रही थी। अनमोल जानता था कि जिया सबके सामने नही बताएगी। हाँ अनमोल ने यह सोच लिया था कि अकेले में मौका देख कर वो उस से ज़रूर
पूछेगा।



to be continue....

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.


Thursday, December 11, 2008

जीवनसाथी (part 2)

करीब 2 बजे रोज़ जिया और अनमोल रोशन के बुलाये गए स्थान पर पहुँच जाते थे। अनमोल आगे आगे और जिया पीछे पीछे अब अनमोल से से जिया को कोई भी दिक्कत महसूस नही होती थी। वो अनमोल को अपने अच्छे दोस्तों में देखने लगी थी। उस पर विश्वास करने लगी थी। क्योंकि कहीं न कहीं जिया को भी लगता था कि वो भी एक सीधे-साधे छोटे शहर से था इसीलिए वो जिया को अच्छे से समझने लगा था। और जिया भी उसे समझने लगी थी। मगर अब भी जिया रोशन को देखती तो देखती रह जाती थी... हालाकि रोशन से उसकी कुछ खास बात नही होती थी क्योंकि रोशन उस से ज्यादा बात ही नही करता था। नाटक एक बहुत ही हास्य विषय पर था। पति पत्नी को बीच होने वाली नोकझोक में कैसे नौकर लोग मज़े लेते है यह नाटक में हास्य रस के साथ अच्छे से दर्शाया गया था। जिया और अनमोल बहुत अच्छे से अपना अपना पात्र प्रस्तुत कर रहे थे।

फिर जब नाटक का दिन आया। जिया को मंच पे सबके सामने आने में हल्का सा डर महसूस हो रहा था। अनमोल को बताना चाहती थी पर वो भी उसके करीब नही था। वो मंच के पीछे तैयार खड़ी थी तभी उसे रोशन दिखा। उसने उसे पुकारा और अपनी परेशानी बताने कि कोशिश की "वो रोशन....ह्म्म्म्म....यूँ सबके सामने....पता नही ठीक से.....ह्म्म्म...वो क्या है न...पहले कभी..."

"तुम फ़िक्र न करो सब ठीक होगा। तुम लोग बहुत अच्छा कर रहे हो। और फिर यहाँ कोई और है भी तो नही बस हम विद्यार्थी लोग ही हैं इनसे क्या डरना।" रोशन बहुत अच्छे से जिया को समझा रहा था। मगर जिया भी कहाँ उसे ठीक से सुन पा रही थी..उसे तो रोशन को एक नज़र भर देखना ही था। खैर यह पहली बार था जब जिया को रोशन अकेले में मिला था और बहुत सी बातें कर रहा था।

फिर कुछ ही महीनो बाद रोशन से उसकी दोस्ती पक्की हो गई थी। अब्ब रोशन और जिया अच्छे से खुल के बातें करते थे। रोशन को जैसा जिया ने सोचा था वो उसके बिल्कुल उलट था। बहुत खुलके और हसी मजाक करने वाला। सबको उसका व्यवहार पसंद था। जिया भी अब रोशन जो चाहे वो कह सकती थी। अब वो उसे देखती ही नही रहती थी बल्कि उसकी बातिएँ भी अच्छे से सुनती और अपनी बातें उसे सुनाती थी। रोशन के सामने वो अनमोल, दीपक, रहमान, महक और टीना सबको भूल जाती थी। जिया क्लास में इन सबके साथ होती थी मगर क्लास के बाद रोशन का साथ ही उसे भाता था। रोशन जहाँ कहता वो उसके साथ चल देती थी। रोशन को वो शिल्पा से भी मिलवा चुकी थी जब एक बार रोशन उसे हॉस्टल तक छोड़ने आया था। शिल्पा को भी रोशन ने अपना दीवाना बना दिया था। जिया और रोशन अक्सर कॉलेज के बहार भी मिलने लगे थे और अब कॉलेज में तो सब उसकी और रोशन की बातें भी करने लगे थे। इसी तरह दिन बीतने लगे।

कॉलेज का एक सत्र ख़त्म होने को था। परीक्षाएं सर पर थी अनमोल और जिया अब पडी पे ध्यान देने लगे। ज्यादा से ज्यादा समय लाइब्रेरी में बीतने लगा था उनका। क्लास नोट्स और किताबें एक दुसरे से share करते थे।

एक दिन अनमोल लाइब्रेरी में आते ही जिया से बोला "रोशन तुमको कैंटीन के पास बुला रहा ही उसे कुछ ज़रूरी काम ही शायद। " जिया बोली "अभी नही ...अभी यह भाग पड़ लूँ फिर जाती हूँ।" अनमोल उसके सामने से किताब अपनी ओर सरकाते हुए बोला "नही फिर नही अभी जाओ। मैं यह भाग पूरा पढ़ कर तुमको कल बता दूंगा अच्छे से अभी तो तुम रोशन की बात सुन लो ध्यान से।"

जिया को यह सब अजीब लगा था। पर फिर भी वो उठी और कैंटीन की ओर चल दी। जैसे ही वो कैंटीन के दरवाजे के पास पहुँची उसे किसी के गाने की आवाज़ सुने दी। "तुम बिन जाऊं कहाँ....तुम बिन जाऊं कहाँ..." जिया ने अंदर जाते ही देखा की यह कोई और नही रोशन ही गा रहा था। जिया को कुछ समझ नही आ रहा था। जिया को देख रोशन और जोरो से गाने लगा। जिया का हाथ थाम कर उसके साथ नाचने लगा। जिया भी खुश होने लगी। फिर गाना ख़त्म होते ही रोशन अपने घुटनों के बल बैठा और एक हाथ जिया की और बड़ा कर उसने कहा.."जिया मुझे नही पता क्यों पर जबसे तुम पढ़ाई की वजह से मुझसे कम मिलने लगी हो मैं तुमको हर पल याद करता हूँ। मुझे पता नही क्या हो गया ही एक एक दिन तुम्हारे साथ बिताया हुआ हर एक पल मुझे याद आता है। मैं ख़ुद पढ़ाई की ओर ध्यान नही दे पा रहा हूँ। रह रह के दिल में यही बात आ रही थी की आज तुमसे कह ही दूँ। शायद तभी मैं पढ़ाई पे पुरा ध्यान दे सकूँ...सोचा था यह बात मैं तुमको कुछ बनके कोई job के ढूँढने के बाद बोलूँगा पर अब रहा नही जाता...इसलिए अच्छा है मैं आज ही बोल दूँ...की.....की....I LOVE YOU......मुझे पता है इस तरह प्यार का इज़हार करना बहुत अजीब लग रहाहोगा तुम्हे..मुझे भी लग रहा है बस अब तुम भी बोल दो की ...YOU LOVE ME TOO.."

to be continue....

Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Wednesday, December 10, 2008

जीवनसाथी (part 1)

"मौसी बारात आ गई है......गली के उस छोर पे है बारात" काजल ज़ोर से बोलती हुई उपर के कमरे तक आई। काजल जिया की मौसेरी बहन है। जिया को भी उसकी आवाज़ सबसे उपर के कमरे तक आ गई थी। जिया मन ही मन सोच रही थी कि आज उसकी शादी है...वो दुल्हन बनी तैयार खड़ी है...सभी ओर खुशियाँ ही खुशियाँ है। जैसा कि वो अपने सपनो में देखा करती थी। कितना कुछ बदल गया है उसकी ज़िन्दगी में पिछले इन 5 सालो में। यह घर नही बदला यहाँ के लोग नही बदले मगर फिर भी कितना कुछ बदल गया है।

उसे याद है जब वो यहाँ के पास ही के स्कूल से 12th पास करके घर आई थी तो उसके घर वाले कितने खुश थे। उसके नम्बर ही इतने अच्छे आए थे। तभी तो उसका दाखिला बड़े आराम से बड़े शहर के बड़े कॉलेज में हो गया था। वो तो बहुत खुश थी उसकी माँ ही बस थोड़ा परेशान थी..क्योंकि वो पहली बार घर से परिवार वालो से दूर जा रही थी। और वो भी इतनी दूर बड़े शहर में ..जहाँ वो किसी को नही जानती थी।

पर उसे फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत ही नही पड़ी उसके पापा और उसके मामा ने उसे एक अच्छे से girls hostel में ठहरवा दिया था जहाँ उसे किसी बात की परेशानी नही थी और माँ को भी बहुत समझाया पापा और मामा ने की माँ मना ही नही कर पायी। डरते डरते रोते रोते विदा किया जिया को।


जिया नए शहर में आके बहुत खुश थी। उसे पहले दिन ही एक अच्छी दोस्त मिल गई थी जो की उसी के कमरे में उसके साथ रहने वाली थी। वो उस से बड़ी थी और शहर के बड़े पोश इलाके में नौकरी करती थी। उसका नाम शिल्पा था। वो यहाँ दो साल से रह रही थी। शिल्पा ने भी येही इसी शहर में अपनी कॉलेज की पढ़ाई की थी और फिर यही काम करने लगी थी। कुछ ही घंटो की बातचीत में शिल्पा से जिया की अच्छी दोस्ती हो गई थी। अगले दिन कॉलेज जाना था। कॉलेज का पहला पहला दिन miss नही करना चाहती थी जिया इसलिए सुबह 7:00 बजे का alarm लगा के वो सो गई।

सुबह 9:00 बजे की क्लास के लिए जिया बहुत जल्दी कॉलेज पहुँच गई थी। कॉलेज में बहुत भीड़ थी..जैसे की कोई मेला लगा हो..शिल्पा ने जिया को बताया था की कॉलेज का माहोल ऐसा ही होता ऐसा ही होता है। क्लास में जैसे ही जिया ने कदम रखा क्लास के सभी लोगो ने तालियाँ बजाना शुरू कर दिया। उसे नही पता था की क्या हो रहा है उसने देखा की क्लास के एक और सब डरे हुए सहमे हुए कोई 30-40 लोग खड़े थे। और क्लास के दूसरी और कुछ रोबदार कुछ हसी ठिठोली करते हुए लोग खड़े थे।

"तुम first year की स्टुडेंट हो" उस रोबदार लोगो में किसी ने जिया से पुछा। जिया कुछ बोल पाये उस से पहले ही वोह फिर बोला...."मैं रोशन हूँ। तुम्हारा सीनियर 3rd year से।" जिया ने देखा वो लंबा-चौडा अच्छी कदकाठी वाला लड़का था। कुछ देर के लिए तो वो सब कुछ भूल कर उसे देखती ही रही।

"हमने एक गेम प्लाट किया है की जो भी अगला नया लड़का और नई लड़की इस क्लास में आएगा वो हमारे अगले कॉलेज में होने वाले नाटक में पति पत्नी के पात्र निभाएंगे। तुम वो लड़की हो इसलिए मुबारक हो। अब देखना यह है की नया लड़का कौन होगा जो तुम्हारे साथ उस नाटक में तुम्हारा पति का पार्ट निभाएगा।"

जिया कुछ समझ नही पा रही थी की यह क्या हो रहा है। मगर उसे वो सब करना होगा जो उसे उसके सीनियर कहेंगे यह बात शिल्पा ने उसे बताई थी। खैर वो भी सबकी तरह अपनी नज़रें क्लास के दरवाजे की ओर लगाये खड़ी हो गई। करीब 10 min बाद एक लड़का क्लास में अंदर आया..वो एक नीली shirt और काली jeans में सिंपल सा लड़का था। पतला दुबला मगर लंबा और चौडे कन्धों वाला लड़का था। रोशन ने उसको भी वही सब समझाया जो उसने जिया को समझाया था..वो लड़का पहले तो हिचकिचाया फिर शायद जिया को देख कर मान गया।

रोशन ने उन दोनों को क्लास में साथ बैठने को कहा...और सदा साथ रहने को कहा। जिया ने उस दिन हरे रंग का सूट डाला था क्योंकि उसे पता था की हरा रंग उसपे बहुत खिलता है। रोशन और उसके साथियों के जाते ही सबने एक गहरी साँस ली फिर एक दुसरे से बातें करने लगे। सब लोग उन सेनिओर्स के बारे में बात करते और उनके रोबदार रवैये को याद कर सहम जाते। जिया को भी बहुत सी बातें पता चली की उसके आने से पहल भी वो लोग नए लड़के लड़कियों से गाना गवाना डांस करवाना एक दुसरे से लडाई करना सब कुछ करवा चुके थे। कई नए लड़को ने मना भी किया तो उनको सज़ा भी दी गई थी। पहले ही दिन जिया सहम गई थी।

तभी क्लास में प्रोफ़ेसर आ गए और क्लास शुरू हो गई। क्लास में सब और शान्ति ही शान्ति थी और प्रोफ़ेसर के जाते ही फिर वही शान्ति भंग हो गई थी। सब लोग एक दुसरे के बारे अच्छे से जानना चाहते थे।

"हेल्लो मेरा नाम अनमोल है। अब हमें साथ ही रहना है तो एक दुसरे के बारे में थोड़ा जान ले तो ठीक रहेगा। आपका नाम....." साथ बैठे उसी लड़के ने जिया से कहा।

"hi. जी मेरा नाम जिया है।....." जिया ने उत्तर दिया। थोडी देर तक अनमोल जिया से बात करता रहा कुछ अपने बारे में बताता और कुछ जिया से पूछता जिया भी बस दो टूक जवाब देती। बाकी का पूर दिन इसी तरह क्लास और बातों में निकल गया। जिया ने दो दोस्त और बना लिए- महक और टीना और उधर अनमोल ने भी कुछ दोस्त बनाये- दीपक और रहमान। सबने एक साथ कैंटीन में खाना भी खाया

जिया का पहला दिन कुछ खास नही गया जैसा की शिल्पा ने उसे बोला था की यह दिन एक यादगार दिन होता है। हाँ जिया ने कुछ नए दोस्त ज़रूर बनाये मगर वो तो रोशन को अपना दोस्त बनाना चाहती थी। खैर अगले कुछ 7-8 दिन ऐसे ही कॉलेज में घुमते घुमते ही चले गए। कॉलेज का खेल का मैदान कॉलेज की लाइब्रेरी कॉलेज के गेट के पास बैठा चाट वाला।

"जिया...जिया..." लाइब्रेरी के पास जिया महक, टीना, दीपक और रहमान के साथ खड़ी थी की तभी उसे आवाज़ सुनाई दी। उसने पलट के देखा तो अनमोल उसे पुकार रहा था। अनमोल के साथ रोशन भी था जिसे देख कर जिया पता नही क्यों खुश सी हो गई थी। जिया बिना कुछ सोचे उस और चल पड़ी। "hello sir....how r you sir" जिया ने रोशन की और देख कर पुछा। "सर नही नही.... जिया सर नही मुझे रोशन ही बोल सकती हो..यार हम एक ही कॉलेज में है ..यह सर सर तो ऐसा लगेगा जैसे की मैं कितना बड़ा हूँ..मैं बिल्कुल ठीक हूँ ...तुमको याद है न हमारा नाटक जिसमें तुम्हे और अनमोल को साथ साथ काम करना है। अनमोल बता रहा था की तुम लोग अब अच्छे दोस्त बन गए हो। अच्छा है अब तुमको साथ साथ काम करने में कोई परेशानी नही होगी।"

"जिया मैंने रोशन को बताया है की मैं पहले भी कई बार नाटक कर चुका हूँ। मुझे स्कूल में भी नाटक करने का बहुत शौक था। रोशन तुम फ़िक्र न करो हम सब संभाल लेंगे। मुझे बहुत अच्छा लगा रोशन की तुम लोगो ने हम नए और fachchas को साथ में ले कर एक event कर रहे हो..." अनमोल बोला।

"नही ऐसी कोई बात नही है वो तो हम लोगो को खुश होना चाहिए की हम नए talent को एक मौका दे रहे है..यह तो बहुत अच्छा है अनमोल की तुम पहले से ही बहुत काम कर चुके हो। फिर तो हमें भी तुमसे कुछ सीखने को मिलेगा। चलो मैं चलता हूँ मुझे जाना है तुम जिया को सही टाइम पे कल ले आना में।

to be continue....
Note : This story is only a Fiction, not real story, It is only for inspirational.

Thursday, December 4, 2008

मैं मुंबई का ताज हूँ।

एक ताज आगरा का और एक मैं ख़ुद मुंबई का ताज ही हूँ।
वो एक मकबरा है और अब मैं एक मकबरा ही हूँ॥
वो किसी की याद में है बना और मैं अब ख़ुद एक याद ही हूँ।
वो किसी के प्यार का प्रतीक है और मैं 56 घंटों के आतंक का प्रतीक ही हूँ॥

कल भी मुझे लोग निहारने आते थे और आज भी लोग मुझे देख रहे है।
कल मेरी खूबसूरती की तारीफ़ होती थी और आज मेरे काले धब्बो पे लोग गौर कर रहे है॥
एक तरफ़ गेट ऑफ़ इंडिया और सामने अपार समुंदर को निहारते लोग हुआ करते थे।
अब बस रह गए है कुछ ही लोग जो बार बार मेरे उन दिनों की याद मुझे दिला रहे है॥

कल यहाँ meetings,parties,dinners और lunches हुआ करते थे।
आज हर तरफ़ दहशत,आतक के निशान,कालिक और धुआ ही धुआ है॥
यहाँ Tata,Birla,Mittal,Ambaani और न जाने कितने लोगो ने कई कठिन फैसले लिए है।
मुझे देखने आए देशमुख और रामू भी जवाब नही दे पाये की वो आए किस लिए है॥

लोगो का इस तरह माजूम और रोश मैंने कभी मुंबई में ना देखा है।
मुझे और मेरे जैसे दूसरी इम्मारातो के लिए कभी इतने हमदर्दों का जलूस ना देखा है॥
देखा है मैं मेरी पनाह में आए कुछ लोगो को खुश होते हुए जश्न मानते हुए।
दहशत से डरे सहमे से गले लग लग कर अंधेरे में रोते हुए उन लोगो को मैंने देखा है॥

भारत में आए लोग आते है घुमते है आते ही पूछते है की आगरा का ताज कहाँ है।
सातो अजूबो में एक उस प्यार की इम्मारत की जैसी मिसाल सब सोचेंगे आज कहाँ है॥
देखेंगे वो हर इम्मार्तों को जायेंगे निहारेंगे हर कोने कोने भारत के अच्छे बुरे यादगार वो पल।
पर अब लगता है सब यहीं पूछेंगे की यह ताज तो ठीक है अब बताओ मुंबई का ताज कहाँ है॥

एक ताज आगरा का और एक मैं ख़ुद मुंबई का ताज ही हूँ
वो एक मकबरा है और अब मैं एक मकबरा ही हूँ
वो किसी की याद में है बना और मैं अब ख़ुद एक याद ही हूँ
वो किसी के प्यार का प्रतीक है और मैं 56 घंटों के आतंक का प्रतीक ही हूँ

Saturday, November 29, 2008

आख़िर क्यों

क्यों आज इंसान खुद ही एक वेहेशी जानवर बन गया है।
क्यों वो आज भी मज़हब के नाम पे लड़ता रह गया है॥
क्या सच में यहाँ कोई मुस्लिम या कोई हिन्दु रह गया है।
क्या एक दुसरे को मारना काटना धर्म का मतलब यही रह गया है॥
क्या यह गीता में लिखा है कि जो हिन्दू है वही इंसान रह गया है।
क्या यह कुरान में लिखा है कि मुस्लिम कौम ही बस एक मज़हब रह गया है॥
क्या इस्सू मसि ने यह कहा है कि रोटी की जगह गोलियाँ ही बांटना रह गया है।
क्या गुरु नानक ने सिखाया है कि दुसरे के घर घुस वहां दहशत बचाना रह गया है॥
कितना कत्ले आम किया अब तो लड़ना छोडें हम अब एक दुसरे को फिर से गले लगना रह गया है।
शान्ति बनाये एकजुट हो जाए एक मानव धर्म निभाए फिर इस धरती माँ को गले लगना ही रह गया है॥
उन वीर जवानों ने अपना धर्म निभाया है अब उनकी इस अनकहीं कुर्बानी का क़र्ज़ निभाना रह गया है।
धरती माँ के वो पूत कुछ करने आए थे जिस मिटटी संग खेले बचपन में उसी में समाना रह गया है॥

Thursday, November 27, 2008

Mumbai Attack-26 Nov 08

yesterday night around 11-12 I was listening my fav Anil show BTS on FM....and anil the show host mentioned that everyone must watched Television for the updated News.....I wondered wat happened...I quickly switched on my Television which was 15 min back switched off by my father...I was shocked that what really happened in mumbai..more than 7 places in Mumbai attacked by Terrorists...the whole night it was going on...all rest is history....the two major Hotels TAJ and OBEROI where all tourism/foriegners deligates..all coporates meetings, seminars going on.......n MISSION to save them is yet to be accomplised...

In past 13 then 26, 13 and now again 26....Is that mean..the next date when we have to be alert is 13 Dec or 13 Jan.....terrorist choosen a pattern to attack....or they really don't care...what is the day..wat is the pattern of chossing dates n timimgs...or they r choosing another date n timing for next attack....are we able to break these terrorism...can we really can stop these types of brutal acts.....or just these terrorist keep choosing dates n timing again n again...and killed innocent people...Is there any ending of all this...??Is there any solution to fight with them??....Is there any path to choosen against these things...??

so what is the real solution..what is the path....one we all fight them back with same energy n same attitude which they have......we ourselves take weapons and fire towards them just like they r doing....we ourselves use our anger as hatred against them...and firing towards them with out caring of other innocent people...Is it right to kill them so brutely.....Do we hv some right to give some thing same as back as they gave us?..do we really give same hatred feling as they r giving to us.??...do we hv a right to kill someone like this...?? Do we really hv a right to kill even those terrorist..?? Do we hv a right to take somebody's life in just few seconds..?? by killing someone like them we r actually killing his views and feelings which was already embeded in others?

Its seems they r more systematic n organised than us...n we never can defeat them.....r we?
Is really the humanity bigger than cursed....?? There r many questions yet to be answered... we r helpless....r we??.....no we r not helpless....

Or we choose another path....path of Mahatma Gandhi(our baapu) who give us the path of Gandhigiri...we just wait n watch...give them another smile...and show them yes we hv more patience than their potential to hurt us....?? just checking the limit of our patience and their potential to kill us....we r attacked by them many times...we all r hoping that it will not happened again...but then we ourselves show them a path..our weakness.

What I am talking abt.....wat we r showing them path...wat weakness??...O really corruption..yes corruption which really make them to enter our security system..and break them...we give them a oppurtunity to enter by just caring abt money, ourselves n our own relatives....we don't care what the person is doing..after entering in the system...we don't care if they entered in secured primises n attack on our country....we don't care what they really carry weapons...we just want the amount they r paying to enter....entry fees ahaaanaa...commisions, corruptions....

what we really can do only asking for help by systems, securitymen, policemen, politicians...what we r doing ourselves for our own security...we all talks abt after every such misshappening that policemen done nothing..INDIA is not a safe country....Politicians r corrupted...Policemen r like this like that..system is not organized n all...n if we talks abt wat to do..then we talk we hv to be united.. we hv to be alert...but r we really united n alerted...I mean we r North Indians, South Indians, Maharastian, Biharies, Orrisies, Kashmiris, Punjabis, Gujjus(Gujraties), Manipuries..etc etc....we hv different states, different religions, different environment, different views, different languages, different festivals, different casts, different local issues, different jobs.............but we r not true INDIANS....

Is this Gandhigiri? no Gandhigiri is we hv to united.....feel like true INDIANS....we all r same at heart...we all r having same feelings, same issues, same basic cultures, same values, same Indian Heart..."PHIR BHI DIL HAI HINDUSTANI".....we hv to make ourselves Mathma Gandhi from inner side...we hv to remove our weaknesses..remove differences, remove corruptions, self alertness against terror, secure ourselves n others, keep tight security at our own level....not to blame others....take ourselves responsibilities...

...this time they want to show the world that INDIA is not a safe place to go.....Is it right??? No way...we hv to do some thing...I do't whether I m right or not....but that for sure that...althought we r having differences among ourselves but we r united for others and take care of not ourselves but others very well...
we can take care of other much more better way than take care of us...we can take care of people/brothers/friends/guestof different society much more than we take care of our own society men becoz they r guest...so from onwards hindu take care of musllim,muslim take care of hindu,punjabi take care of kashmiries, maharastian take care of biharies....n so on....

and now when these terrorist attack on our guest of our own country from different countries we can take care of them better than take care of us.....and will show to the world that INDIA is Safe for other countrymen...INDIA can fight these terrorism by ourselves...INDIA doesn't need any type of help from other country...INDIA will fight it with its own way...whether by "strong fight with weapon" OR "Gandhigiri with strong united n coruptionless society"..............

What do you think my friends....Am I right..or Wrong somewhere?
Plzz share ur views....

Wednesday, November 26, 2008

क्या कहूँ कैसे लग रहे हो, (तारीफ)

क्या कहूँ कैसे लग रहे हो,
handsome,dashing,smart जो भी कहो,
मगर इस white dress में तुम अच्छे लग रहे हो....


क्या कहूँ यह जो खुशी आपके चेहरे पे नज़र आ रही है,
क्या राज़ छिपा था इतने दिन दिल में यह कहे जा रही है,
इन खुशियों के पीछे कोई भी हो जो भी है आपको बहुत रास आ रही है,
चेहरे को चहका रही है या प्यार है जो किसी के लिए आपका बता रही है,

Tuesday, November 25, 2008

वो प्यार है।

1) दिल की कही को जो कई अरमान बना दे वो प्यार है।

दिल की गुस्ताखी को दिल की लगी बना दे वो प्यार है।

हम तो हमेशा कहेंगे की हाँ हमें तुम से प्यार है।

न जाने कब जवाब आएगा की तुमको भी हम से प्यार है।

2) एक दुल्हन अपने दुल्हे की बारात देखते हुए सोचती है।

किसी को बताती नहीं है बस यूहि यह बात दिल में रखती है।

इससे पहले तुमको जब भी देखा बस मैंने यूहि देखा।

पर आज जब देखा तो लगा वाह यह मैंने क्या देखा।

पहले मैंने सोचा था तुम मेरे लिए यार,प्यार,दिलदार हो।

आज तो तुम घोड़ी पे बैठे मेरे वो ही सपनो के राजकुमार हो।

Thursday, November 20, 2008

Win and Lose

some days back i got a SMS from one of my friend.....i.e.

If you win you not need to explain it....but if you lose you should not be there to explain.....

for few days i was thinking over it..is it really the case......well there is a my inner soul who answered it as....

explanation doesn't give you reason to try it once again to win....instead of explanation you have to find lots of courage,confidence and strong reason to win it at next time...


I don't know weather it is right or not.....or is it really i believe n implemented it accurately.....but yes it must be pure feeling..becoz its come from my inner soul.........

tell me urs views on this topic...........